Thursday, 1 January 2026

shayri

हर अदा देखभाल रक्खी है .
 हमने दुनिया खँगाल रक्खी है.
जितनी नेकी का दम्भ भरते हो, 
उतनी दरिया में डाल रक्खी है.
-संजय तन्हा 

ग़ज़ल

दवा की पर्चियाँ बनवा रहा हूँ।
मैं टूटी पसलियाँ बनवा रहा हूँ।।

वो तिनके कानों से अब फेंक देना,
तुम्हारी बालियाँ बनवा रहा हूँ।

जो काम आईं न मेरे,फाड़ दीं वो;
नई अब डिग्रियाँ बनवा रहा हूँ।

रुपहले झूठ को लिखने की ख़ातिर।
सुनहरी उँगलियाँ बनवा रहा हूँ।।

पड़े थे घूस को कम पिछले बंडल।
बड़ी अब गड्डियाँ बनवा रहा हूँ।।

सभी की रैलियों में भाग लूंगा।
सभी की टोपियाँ बनवा रहा हूँ।

सुधर जाए लिखावट फिर से शायद।
क़लम और तख़्तियाँ बनवा रहा हूँ।।

मुझे जो फ़ालतू लगता शजर था।
उसी की कुर्सियाँ बनवा रहा हूँ।।

पुरानी तो पड़ी कूड़े में होंगी।
नई कुछ अर्ज़ियाँ बनवा रहा हूँ।

कराकर बारिशें दरिया के ऊपर।
नदी में बूंदियाँ बनवा रहा हूँ।।

ख़बर तो बनके हैं तैयार काफ़ी।
मैं तो अब सुर्ख़ियां बनवा रहा हूँ।।
@
संजय तन्हा

Thursday, 3 August 2023

shayri

ज़ख्म ताज़ा तरीन कर लूँ क्या ?
फ़िर किसी पर यक़ीन कर लूँ क्या ?
आदमी हूँ थकन भी होती है 
जिस्म अपना मशीन कर लूँ क्या ?
-संजय तनहा 

Friday, 10 March 2023

चंद शेर



होता है इस तरह भी तो कितनों का फ़ैसला,

कव्वे बख़ूबी करते हैं हंसों का फ़ैसला।


अंधेरगर्दी मच रही हर सम्त देखिए

पगडंडियों पे हो रहा रस्तों का फ़ैसला।


इक तानाशाह सत्ता को ठोका नहीं सलाम

मंज़ूर हाथों ने किया कीलों का फ़ैसला।


कमज़ोर की कहीं नहीं सुनवाई आज भी,

चिड़ियों पे थोपा जाता है गिद्धों का फ़ैसला,


Monday, 20 February 2023

शेर

 भूख ग़रीबी सदमात पढा देते हैं।

पुस्तक से अधिक हालात हैं।।

@

संजय तन्हा

Wednesday, 1 August 2018

व्यंग्य

नेकी कर सेल्फ़ी में डाल..

वो ट्रेंड गया जब नेकियाँ दरिया में डाली जाती थीं। आजकल नेकियों को फोटो में डालने का फैशन जोरों पर है। स्मार्ट फोनो ने सेल्फियाँ की बाढ़ सी ला रखी है।कुछ भी करना हो कि हाथ खुद ब खुद सेल्फी लेने चला जाता है।यहां तक कि हमारे घर के पालतू जानवर भी जान गए हैं कि जब सेल्फी ली जा रही हो तो कैसे मुंह बनाना है।अब नेकियाँ कर रहे हैं तो दिखनी भी चाहिएं। दिखावट का जमाना है।नेकी कम भी करो मगर उसका ढोल ज्यादा से ज्यादा पीटो ताकि लोगों को लगे कि बड़ा ही 'नेक' बन्दा है।

आजकल दरिया साफ नही हैं, क्या डालें उनमें! दरिया हमारी 'आधुनिक' सोच, 'सभ्य' समाज और 'भव्य' राजनीति की भेंट चढ़ चुके हैं। बहुत समय तक नेकियाँ दरियाओं में डाली गईं।तब शायद हमारे पास और कुछ विकल्प नहीं था,मगर अब बेहतर विकल्प मौजूद है सेल्फी।हमारे पूर्वजों के पास भी यदि डबल कैमरे वाला फोन होता तो हो सकता है वो भी नेकियों को सेल्फियाँ में डालते,मगर अफ़सोस उन्हें दरिया से ही काम चलाना पड़ा।

आजकल सोशल साइट्स ऐसी नेकियों से अटी
पड़ी हैं।सोशल साइट्स रूपी दरिया में नेकियों की सेल्फियाँ हिलोरें मार रही हैं। यदि यही नेकियाँ दरिया में डाल दी जातीं तो दिखाई भी न देतीं हिलोरें मारने की बात तो बहुत दूर। आजकल की नेकियों से हो सकता है दरियाऔर भी प्रदूषित हो जाएं..क्योंकि नेकियाँ ही इतनी ज्यादा संख्या म होने लगी हैं। अच्छा है अब इन्हें दरियाओं में नही डाला जा रहा।

एक पौधा लगाया नहीं कि ले डालीं धड़ाधड़ सेल्फियाँ!! चाहे बाद में उस पौधे की सुध भी न लें।मगर ये फोटो फेसबुक,इंस्टाग्राम,ट्विटर व्हाट्सएप्प सब जगह चिल्ला चिल्ला कर वृक्षारोपण की मुनादी कर देगा। थोड़ा बहुत कूड़ा इधर-उधर से लाकर,उसकी सफ़ाई करते वक़्त,किसी की मदद करते समय, किसी नेता के साथ रिबन काटते वक़्त या किसी ब्लड डोनेशन कैम्प के दौरान ख़ुद की सेल्फ़ी लेना बेहद जरूरी और पुण्य का काम है। कहीं कोई दान वगैरह करना हो तो छाया चित्र ज़रूर ले लें। चित्र गुप्त इसका लेखा-जोखा रखने लगा है।आपका परलोक सुधारने में सेल्फ़ी अहम रोल निभा सकती है, भले ही आपका यह लोक कितना भी बिगड़ा क्यों न रहा हो।

जबसे फोन में फ्रंट कैमरा आया है तबसे हमारी अदाकारी में इज़ाफ़ा हुआ है।हमें भिन्न भिन्न मुख मुद्राएं बनानी पड़ती हैं तब कहीं जाकर एक आध सेल्फ़ी ठीक ठाक आती है।और तो और मुँह की मुद्राएँ बिगाड़ बिगाड़ कर भी सेल्फियाँ ख़ूब ली जा रही हैं। ये शायद अब स्टाइल में शामिल है। भले ही हम उदास हों पर यदि कोई हमे अपने साथ सेल्फी में कैद करने चाहता है तो हमें मुख पर झूठी मुस्कुराहट लानी पड़ती है।लोग बस अब सेल्फियों में ख़ुश हैं।

सेल्फियाँ पक्का सबूत होती हैं कि हमने अमुक-अमुक महान कार्य किये हैं।अखबारों तक में ख़बरें बन जाती हैं। ट्वीटर पर ट्रोल होने लगती हैं,ट्रेंड में छा जाती हैं।आप हो सकता है कि रातों रात स्टार बन जाएं।आप सोशल एक्टिविस्ट के तौर पर पहचाने जा सकते हैं।
एक अच्छी और बेहतरीन तरीके से ली गई सेल्फ़ी आपका भाग्य बदल सकती है।आपको शोहरत की बुलंदियों पर ले जा सकती है।आपको समाज सुधारक का दर्जा दिला सकती है।बहुत दम होता है सेल्फियों में साहब।इन्हें 'अंडर एस्टीमेट' न करें।
~संजय तन्हा

Monday, 8 February 2016

sher

डाल दो हल्की सी नज़र हम पर।
हाय थोड़ा तो भाव दे जाओ।।
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संजय तन्हा