Thursday, 1 January 2026

shayri

हर अदा देखभाल रक्खी है .
 हमने दुनिया खँगाल रक्खी है.
जितनी नेकी का दम्भ भरते हो, 
उतनी दरिया में डाल रक्खी है.
-संजय तन्हा 

ग़ज़ल

दवा की पर्चियाँ बनवा रहा हूँ।
मैं टूटी पसलियाँ बनवा रहा हूँ।।

वो तिनके कानों से अब फेंक देना,
तुम्हारी बालियाँ बनवा रहा हूँ।

जो काम आईं न मेरे,फाड़ दीं वो;
नई अब डिग्रियाँ बनवा रहा हूँ।

रुपहले झूठ को लिखने की ख़ातिर।
सुनहरी उँगलियाँ बनवा रहा हूँ।।

पड़े थे घूस को कम पिछले बंडल।
बड़ी अब गड्डियाँ बनवा रहा हूँ।।

सभी की रैलियों में भाग लूंगा।
सभी की टोपियाँ बनवा रहा हूँ।

सुधर जाए लिखावट फिर से शायद।
क़लम और तख़्तियाँ बनवा रहा हूँ।।

मुझे जो फ़ालतू लगता शजर था।
उसी की कुर्सियाँ बनवा रहा हूँ।।

पुरानी तो पड़ी कूड़े में होंगी।
नई कुछ अर्ज़ियाँ बनवा रहा हूँ।

कराकर बारिशें दरिया के ऊपर।
नदी में बूंदियाँ बनवा रहा हूँ।।

ख़बर तो बनके हैं तैयार काफ़ी।
मैं तो अब सुर्ख़ियां बनवा रहा हूँ।।
@
संजय तन्हा