ज़ख्म ताज़ा तरीन कर लूँ क्या ?
फ़िर किसी पर यक़ीन कर लूँ क्या ?
आदमी हूँ थकन भी होती है
जिस्म अपना मशीन कर लूँ क्या ?
-संजय तनहा
होता है इस तरह भी तो कितनों का फ़ैसला,
कव्वे बख़ूबी करते हैं हंसों का फ़ैसला।
अंधेरगर्दी मच रही हर सम्त देखिए
पगडंडियों पे हो रहा रस्तों का फ़ैसला।
इक तानाशाह सत्ता को ठोका नहीं सलाम
मंज़ूर हाथों ने किया कीलों का फ़ैसला।
कमज़ोर की कहीं नहीं सुनवाई आज भी,
चिड़ियों पे थोपा जाता है गिद्धों का फ़ैसला,